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28 मुगल साम्राज्य के पत्तन के कारण | Reasons Why Mughal Empire Decline

1526 में बाबर ने मुग़ल साम्राज्य की स्थापना की थी।  कई क्षमतावान उत्तराधिकारी ने इस साम्राज्य की बुनियाद को मजबुत बनाया। बड़े तोर पर हम मान सकते है 1717 में औरंगज़ेब के मृत्यु के बाद मुग़ल के पतन ने गति पकड़ी और 1857 के विप्लव के बाद राजवंश का नाश हो गया। महान और शक्तिशाली मुगल साम्राज्य के पतन के पीछे एक नहीं कई कारण जवाबदार थे। औरंगजेब के सख्त शासनकाल के दौरान ही पतन शुरू हो गया था। सवाल यह है कि इस गिरावट के पीछे क्या कारण है?


मुगल साम्राज्य गिरने के 28 कारण (Mughal empire Fall)


1. सुदूर दक्षिण भारत में विस्तारवादी नीति (Expanist policy in far south India)

पहले से ही औरंगजेब के पास प्रशासन करने के लिए एक बड़ा क्षेत्र था। फिर भी उसने सुदूर दक्षिण भारत में क्षेत्र का विस्तार करने के लिए युद्ध में संसाधनों को बर्बाद कर दिया।


2. केंद्रीकृत प्रशासन (Centralized administration)

औरंगजेब ने प्रशासन की केंद्रीकृत प्रणाली अपनाई। इस आधुनिक समय में भी, एक बड़े और वैविध्य से भरपूर देश में केंद्रीयकृत प्रशासन चलाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है तो उस समय तो ना मुमकिन ही था। लेकिन औरंगज़ेब देश में केंद्रीकृत शासन नहीं देने में असफल रहा।  


3. मराठा के साथ अर्थहीन युद्ध (Meaningless war with Maratha)

औरंगजेब ने मराठा की प्रांतीय स्वतंत्रता को स्वीकार नहीं किया। वह समझ नहीं पा रहा था कि शिवाजी जैसे योद्धा मराठा को दबाना आसान नहीं है। इस युद्ध में ना मराठा को हरा सका ना कोई संधि कर सका। जिसमे जान-माल के साथ मुग़ल के रुतबे को भी हानि पोह्ची। 


4. राजधानी दिल्ली के सिंहासन से 25 साल की अनुपस्थिति (25 years absence from capital Delhi Throne)

औरंगजेब दक्षिण भारत में 25 साल से अधिक समय गुजरा। फिर भी मराठा के खिलाफ युद्ध हार गया। हम अनुमान लगा सकते है की राजा के बगैर की गद्दी कई आपदा को आमंत्रित करती है। 

Mughal empire decline


5. बहुत महत्वपूर्ण उत्तर-पश्चिम सीमा की उपेक्षा (Ignorance of very important far north-west border)

उत्तर -पचिम क्षेत्र स्थानीय और प्रांतीय अधिकारी केंद्रीय प्रशासन की उपेक्षा करने लगे और आजादी पाने का मौका ढूंढने लगे । स्वतंत्रता के लिए अपने आप को तैयार करने लगे राजा की गैर मौजूदगी ने इसको नहीं रोका जिसने आगे चलकर मुग़ल को तोड़ने में भागीदारी की। यह वह सीमा है जहां से विदेशी आक्रमणकारी का खतरा बना रहता है। 


6. राजपूत राजाओं के साथ लड़ाई (Fight with Rajput kings)

भुतकाल में मुगल और राजपूत एक साथ दुश्मनो से लड़े थे। जसवंसिंह और जयसिंह को औरंगजेब दरबार में शरुआती कार्यकाल में उच्च स्थान मिला हुआ था। बाद में मुगल द्वारा राजपूत की भूमि हड़पने और राजपुतो के आतंरिक मामलो में दखल देने से संबंध खराब हो गए।


7. राजपुताना की अलगाववाद नीति (Separatism policy of Rajputana)

राजपुत अपने बलिदान के लिए जाने जाते है उनकी मित्रता ही इस बडे हिंदू समुदाय पर राज करने में मुग़ल को मदद करती थी। लेकिन राजपुताना के साथ युद्ध ने मुगल साम्राज्य में अलगाववाद को बढ़ावा दिया। जिसने हिंदू -मुस्लिम एकता में भंग डाला। राजपूत से फायदे की बजाए मुग़ल को नुकशान उठाना पड़ा। 


8. दिल्ली के आसपास  में विद्रोह (Delhi face rebellion)

संवेदनशील दिल्ली में जाटों, सतनामी और सिखों के एक विशाल विद्रोह का किया। वे सभी सामंती उत्पीड़न से  नाखुश थे। इस आत्मघाती विद्रोह को दबाने में मुग़ल को बहुत कष्ट झेलना पड़ा। ऐसे विद्रोहों ने मुग़ल की छबि को धूमिल किया। 


9. धार्मिक रूढ़िवादी दृष्टिकोण (Religious conservative approach)

अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ के शासन काल मुगल साम्राज्य धर्मनिरपेक्ष था । मुस्लिम लोगों को दिल जीतने के लिए औरंगजेब कट्टर नीति को स्वीकार किया  मुगल साम्राज्य का मुख्य स्तंभ धर्मनिरपेक्ष प्रशासन पर टिका है लेकिन औरंगज़ेब प्रशासन के दौरान कई धार्मिक गतिविधियों में हस्तक्षेप किया। जिससे समुदाय और प्रशासन के बीच विश्वास में कमी आई।


10. जजिया कर और हिंदू विरोधी गतिविधि (Jizyah tax and anti-Hindu activity)

औरंगज़ेब ने हिंदुओं पर जजिया कर लगाया। जजिया कर मुख्य रूप से गैरमुस्लिम समुदाय से लिया जाता है। इस कर का अर्थ है इस्लाम का पालन नहीं करने के लिए दंडित करना।
औरंगज़ेब के काल में उत्तर भारत क्षेत्र में कई मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया और हिंदुओं पर की प्रकार के प्रतिबंध लागू कर दिए गए। जिससे शासन के प्रति नफरत की भावना बढ़ी। 


11. उत्तराधिकारी के लिए लड़ाई (Fight for successor)

औरंगज़ेब ने मुग़ल साम्राज्य के सामने कई अनसुलझी समस्याएं छोड़ दीं। लेकिन स्थिति तब और कठिन हो जाती है जब वह बिना उत्तराधिकारी के मर जाता है।

मुगल के उत्तराधिकारी के लिए कोई परिभाषित नियम नहीं हैं। इसलिए जब भी कोई बादशाह मरता है उसके बाद उत्तराधिकारी के लिए संघर्ष होता ही है।


12. कमजोर उत्तराधिकारी (Weak successor)

इतिहास में कई साम्राज्य गिरे हैं और फिर से उठे हैं लेकिन मुगल साम्राज्य में औरेंगजेग के बाद केवल बहादुर शाह के पास अपनी विरासत को बहाल करने के लिए गुणों और क्षमता थी। लेकिन दुख की बात यह है कि बहादुर शाह जल्दी मर जाने से आखिरी उम्मीद भी नहीं रही।


13. प्रशिक्षित कमांडर का खोना (loss of trained commander)

उत्तराधिकारी के संघर्ष में कुलीनों ने आपसमे लड़कर अपने प्रशिक्षित और काबिल कमांडर की बलि चढ़ादी। संघर्ष सालो तक चला योग्य सैनिक बलि चढ़ते रहे और नए सैनिक को प्रशिक्षित नहीं करने की वजह से सैना में गिरावट आई। 


14. सामंतो की स्वतंत्रता का दावा (Feudal assert their independence)

विभिन्न प्रांतों में सामंत सत्ता के इस संधर्ष का लाभ उठाकर खुद को स्वतंत्र घोषित करने लगे। ज्यादातर सामंतों ने अपने पद को वंशानुगत बना लिया था। बादशाह ने भी उस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई। जिससे मुग़लो का विस्तार कम होने लगा।


15. कुलीनों के व्यवहार में गिरावट (Decline behavior of nobles)

बादशाह के बाद शासन कुलीन वर्ग के व्यवहार और संगठन पर निर्भर होता है। यदि कुलीन वर्ग सतर्क, ईमानदार और प्रभावी हैं तो कोई फर्क नहीं पड़ता कि राजा कैसा है। साम्राज्य अपने सही धाराप्रवाह में चलता रहता है।

लेकिन समस्या कुलीन वर्ग में व्यवहार और नैतिकता की गिरावट की थी। वे बहुत स्वार्थी हो गए थे। अब कुलीन कोई शिक्षा या प्रशिक्षण नहीं लेता था बस आराम से संपत्ति का उपभोग करता था। कुलीन युद्ध क्षेत्र में सभी भोग-विलास की चीजें साथ ले जाने लगेथे।

वे अपनी आय से अधिक खर्च करते थे और आलसी हो चुके हैं जो पूरा दिन भोग-विलास में बिताते थे।क्षमतावान कुलीन भी थे हैं लेकिन वे आंतरिक संघर्ष में व्यस्त थे जिसकी क्षमता का फायदा साम्राज्य न हुआ।


16. प्रशासन में भ्रष्टाचार और अनियमितता (Corruption and internal tension)

अधिकारी अधिक शक्ति, ज्यादा अधिकार और धन हड़पने के लिए भ्रष्ट हो गए थे। कई अधिकारी इस लड़ाई में राजा के खिलाफ भी बल और चालबाजी का इस्तेमाल करने लगे। इस प्रकार की गतिविधि से समाज में नैतिक मूल्य में कमी आने लगी। कई इतिहासकार मुगल साम्राज्य के पतन का सबसे जिम्मेदार कारण कुलीनों और अधिकारी के व्यवहार में गिरावट को मानते हैं।


17. किसान का शोषण (Exploitation of farmer)

सीमित भूमि कुलीनों के लालच को पूरा नहीं कर पा रही थी जिससे वे अधिक कर वसूल कर किसानों का शोषण करते थे। कर बढ़ाएँ और ज़मीन हड़पने लगे जिससे किसान समुदायों में विश्वास कम हो गया।  जनता के विश्वास के बिना कोई भी राजा शासन नहीं कर सकता। इसका परिणाम यह था की अब जनता भी शासन के प्रति वफादारी छोड़ने लगी थी। 


18. खालसा भूमि पर कब्जा (Possession of Khalsa land)

पहला सवाल यह है की 

खालसा जमीन क्या है?

केंद्र द्वारा प्रशासित भूमि को खालसा भूमि कहते है । इसका मतलब है कि इस भूमि का मालिक राजा था, इस भूमि पर गतिविधि का फैसला राजा द्वारा किया जाएगा, और इससे उत्पन्न राजस्व को सीधे खजाने में जोड़ा जाता था।

जैसा कि हम ऊपर देख चुके हैं कि कुलीनों अपनी लालच को पूरा करने के लिए  किसानो की जमीन के साथ राज्य की खालसा जमीन भी हड़प लेते थे।  इसलिए केंद्र का राजस्व आय घटने लगा जिसके कारण आर्थिक संकट और बजट असंतुलित हो गया।


19. बजट में असंतुलन से सेना की ताकत कमी (Unbalancing in budget decrease army strength)

प्रांतीय सामंत कर देने से मना कर देते थे या कम देते थे। किसानो की खराब हालत कर चुकाने योग्य नहीं रही थी और व्यापार तो उस समय नगण्य मात्र ही था। जिससे आय के स्रोतों में कमी होने लगी तो बजट असंतुलन यानि की खर्च कम करने के लिए सैनिको की संख्या कम करने लगे। 

decline of mughal


20. लोगों की बुनियादी जरूरत पूरी न हो पाना (not able to fulfill the basic need of people)

किसान संकट, आर्थिक संकट और सैनिक की बेरोजगारी ने जीवन निर्वाह का प्रश्न खड़ा कर दिया जिसको पुरा करना प्रशासन के बस की बात न थी।



21. ज़मींदार का बार-बार बदलना (Frequent changing of the zamindar)

जमींदार के बार-बार बदलने से वह सीमित समय में अधिक राजस्व इकट्ठा करते थे। जिससे किसान और भूमि का अधिक शोषण होने लगा। खेतिकीय तनाव ने आर्थिक गतिविधि को भारी नुकशान पहोचाया। 


22. एजारा प्रणाली में वृद्धि (Increase in Ezara system)

एजारा प्रणाली का मतलब है जो ज्यादा कर इकट्ठा करने की बोली लगता है उसको उस क्षेत्र की जागीरदारी दे दी जाती थी। बोली तो ज्यादा लगा देते थे पर उतना धन जमा करने के लिए गरीब किसान के ऊपर बहुत अत्याचार करते थे। जमीन- जायदाद बेच देते थे। इस प्रणाली ने किसान पेशे को लगभग समाप्त कर दिया और समाज में तनाव फैला दिया।


23. उद्योग और व्यापार की अवहेलना (A rigid approach toward industry and business)

यूरोपीय देशो में इस समयावधि के दौरान औद्योगीकरण, विज्ञान और प्रौद्योगिकी पर ध्यान केंद्रित किया गया। लेकिन भारत के किसी शासक ने उद्योग या व्यवसाय के लिए कोई प्रचार या प्रोत्साहन देने वाली निति नहीं अपनाई और हमारा विश्व निर्यात घटकर नगण्य हो गया।


24. नौसेना नहीं बनाना (Ignorance of navy)

महान साम्राज्य मुगलों ने नौसेना की उपेक्षा की जो पूरे इतिहास को बदल देने की क्षमता रखती थी। यूरोपीय शक्ति से लड़ने के लिए एक मजबूत नौसेना की आवश्यकता थी और उस समय भारत के बड़े शासक होने के नाते यह जवाबदारी मुग़ल के सर पर थी। 

औरंगजेब युद्ध में अंग्रेजों को पूर्ण तरह से भगा न सका क्योकि अंग्रेजो भाग कर द्वीप पर शरण ले लेते थे और वहा जाने के लिए नौसेना नहीं थी। उस युद्ध अनुभव के बाद भी औरेंगजेब ने नौसेना के महत्व को नहीं समझा। 

इतनी कठिन परिस्थितिके बाद भी स्थल पर मुग़ल सेना अंग्रेजो प भारी थी परतुं उसका बल समुद्र के किनारे तक ही सीमित रहा। जिसका लाभ उठा कर यूरोपियो ने अपनी सत्ता स्थापित कर ली।  


25. राष्ट्रीय भावनाओं की कमी (lack of national sentiments)

भारत में राष्ट्रीय भावना का विकास 20 वीं शताब्दी के प्रारंभ में हुआ। मुगल काल में कोई राष्ट्रीय भावना नहीं थी। जिसमें लोगों को कोई आपत्ति ही नहीं थी की कौन शासक है कौन पडोसी राज है। लोगो की भावनाए सिर्फ अपने मोहल्ले या गांव तक ही सिमित थी। 


26. कानून और व्यवस्था की अवज्ञा (Disobedience of law and order)

18 वीं शताब्दी में कानून और व्यवस्था की अवज्ञा की कई घटनाएं सामने आई।  विद्रोहियो को खुला हाथ मिलने लगा, वे लूटते थे और बिना किसी डर के आदेश की अनदेखी करते थे। यहां तक ​​कि मुगलों की शाही सेना को भी रास्ते में लूट लिया जाता था।


27. मुगल शाही सेना का पतन (Decline of  Mughal royal army)

उपरोक्त सभी कारणों के कारण रॉयल मुगल सेना ने अपना अनुशासन और क्षमता दोनों खो दीये। सेना को भुगतान में देरी हुई या तो लम्बे समय तक भुगतान होता ही नहीं था। 

जिस वजह से सेना में विद्रोह की भावना पनपने लगी और प्रमाणिकता कम होने लगी। महान और मजबूत सेना बेकार हो जाती है तो वह आक्रमणकारियों को आकर्षित करती है।


28. विदेशी आक्रमण (Foreign invasion)

नादिर शाह और अहमद शाह अब्दाली के आक्रमण से मुगल साम्राज्य को अंतिम धक्का। वे राजधानी दिल्ली को महीनो तक रोंदा जो भविष्य में कभी खड़ी न हो सकी।

Note : ऊपर के कारणों से यह मत समझ लेना की औरंगज़ेब का चारित्र्य बुरा था। औरंगज़ेब न तो कमजोर और नहीं पतित था। वह काफी योग्य व क्षमतावान था। वह बहुत साधारण व सादगीपूर्ण जीवन जीता था उसमे अन्य राजाओ के दुर्गुणों जैसा कुछ नहीं था। उसकी विफलता का कारण यह था की उसके पास राजनीतिक , सामाजिक और आर्थिक दूरदर्शिता नहीं थी।  उसके व्यक्तित्व में कोई खामी न थी खामी उसकी नीतियों में थी।   


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