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What is communalism meaning in Hindi : Stages,Causes and Solution | सांप्रदायिकता क्या है?


सांप्रदायिकता के अर्थ को समजने से पहले में कुछ प्रश्न पूछता हूँ क्या में कोई धर्म को मानता हु तो में सांप्रदायिक हूँ ? क्या में किसी धर्म के रीत -रिवाज को मानता हुतो में सांप्रदायिक(Communal) हूँ ?  नहीं, आप सांप्रदायिक नहीं हे आप  एक धार्मिक इंसान हैं | तो फिर सांप्रदायिक कोण हैं ? चलिए एक विस्तृत निबंध के तौर पर इसको जानते है। 

कोमवाद क्या हैं? (whot is communal Meaning)


जो व्यक्ति किसी एक धर्म के पालन करने वाले लोगो को समान मानता तथा अन्य धर्म के लोगो को अलग समझता हैं  और अंत में एक धर्म का दूसरे धर्म का विरोधी मानता हैं। वह व्यक्ति सांप्रदायिक विचारो वाला है। समाज में ऐसे लोग अपनी कोम को सर्वोच्च मानते है जिसे कोमवाद कहते है। (Defination of Communalism)

सांप्रदायिकता के बारे में बात शरू करने से पहले के हम यह समजले की धार्मिकता को संप्रदायिकता के साथ कुछ लेना देना नहीं है। सांप्रदायिकता एक मन की विचारधारा है लोग सिर्फ अपने कट्टर विचार तो सही साबित करने के लिए धार्मिकता का गलत इस्तमाल करते है। 

सांप्रदायिकता के स्तर (Stages of communalism)

प्रथम स्तर (1st stage)

प्रथम स्तरीय सांप्रदायिक व्यक्ति का यह मानना होता है की समान धर्म के सभी लोगो का सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक और आर्थिक हित एक समान है। 

 उदाहरण
एक हिन्दू व्यक्ति यह माने की सारे हिंदु एक हैं सबको साथ में काम करना चाहिए ,साथ में रहना चाहिए और हिन्दू जाती को एक समूह मानना। 

द्वितीय स्तर (2nd stage)

सांप्रदायिकता के दूसरे चरण में व्यक्ति यह मानने लगता है की एक धर्म दूसरे धर्म से बिलकुल भिन्न।  दोनों धर्म के लोगो का सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक और आर्थिक हित भी भिन्न हैं।  

उदाहरण 

कोई मुसलमान यह माने की दीपावली और होली जैसे त्योहार सिर्फ हिन्दू के ही फायदे में है और यह बात कोई हिन्दू ईद और रोज़ा जैसे त्योहार के बारेमें सोचता हैं।  मतलब की मंदिर में सिर्फ हिन्दू को भगवान मिलेगा और मस्जिद में सिर्फ मुसलमानो को खुदा मिलेगा ऐसा मानना संप्रदायिकता का दुसरा चरण दिखता है। 


तृतीय स्तर (3rd stage)

यह सांप्रदायिकता का अंतिम चरण हैं जिसमे एक धर्म का व्यक्ति दूसरे धर्म को धृणा या नफरत की भावना से देखता है। अपना धर्म सर्वौच्च और दुसरो के धर्म को निचा मानना। इसी स्तर से दूसरे धर्मो से विरोध उत्पन्न होता है। धार्मिक कट्टरता इसी स्तर में आ जाती हैं।


उदाहरण

व्यक्ति का ऐसा मानना की एक म्यान में दो तलवार नही रह सकती वैसे एक देश , एक महोल मे दो धर्म के लोग नही रह सकते।




भारत मे सांप्रदायिकता का विकास ? (How communalism spread in india)


भारत के मध्यकाल में मुस्लिम राजाओं था। लेकिन इस काल में साम्प्रदायका का कोई पुरावा नही है। हा, कभी कभी दो धर्म के लोगो के बीच लड़ाई या दंगे होते थे लेकिन आज जो संप्रदायवाद हम देखते हैं वह मध्यकालीन भारत का नही है।

तब प्रश्न होता हैं कि इस साम्प्रदायिकता केसे फैली?

साम्प्रदायिकता के बीज ब्रिटीशरो अपने शासन को चलाने और देशवासी को आपसमे लड़ने के लिए बोये थे। चलिए इसे कई ऐसी घटनाओ द्वारा समझते हैं। 

1857 के विप्लव के बाद ब्रिटीशरो ने जानबुज के मुस्लिम को जवाबदार ठहराकर और उनके ऊपर अत्याचार किया और भेदभाव की नीति अपनाई। विप्लव बाद अकेले दिल्ही में 27000 मुस्लिम को फांसी दी गई थी। हालाकि विप्लव में सभी धर्म के लोगो ने समान बलिदान दिया था। मुस्लिम को सजा ओर हिन्दू को पुरस्कार देकर ब्रिटीशरो ने साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया। 

लेकिन 1870 के बाद यह क्रम उल्टा हो गया जब पढ़े लिखे हिन्दू लोग आजादी की मांग करने लगे। अंग्रेजो की निति से ज्यादातर मुसलमान निरक्षर रहे बाद में फुट डालने की निति के चलते मुस्लमान के मसीहा बन गए और हिन्दू के दुश्मन समजाने लगे।

मुस्लिम समाज सुधारक सैयद अहमद खान शरु के वर्षों में बिन सम्प्रदायिक थे वह हंमेशा हिन्दू- मुस्लिम एकता की बात करते थे 1883 में  उसने कहा था कि

" हम दोनों भारत की हवा में सांस लेते है और गंगा-यमुना का पवित्र जल पीते हैं | हम दोनों भारत की धरती का अनाज खाकर जीवित रहते हैं | जीवन और मृत्यु, दोनों में हम एक साथ हैं | भारत में हमारे निवास ने हम दोनों का खून बदल डाला हैं, हमारे शरीरों के रंग समान हो चुके हैं | हम दोनों की प्रगति साथ रहने में हैं | "


लेकिन सैयद अहमद खान अपने जीवन के अंतिम वर्षो में साप्रदायिकता की ओर जुक गए। जिसने मुस्लिम समाज में सांप्रदायिक विचार को बढ़ाया।

स्वामि दयानंद के आर्य समाज और सैयद अहमद खान के अलीगढ़ आंदोलन समाज सुधार के लिए शुरू हुआ था लेकिन राजनेतिक स्वार्थ के चलते ऐसे समूहों आपसी स्पर्धामे उतर गए जिससे हिन्दू-मुस्लिम और दूर चले गए।

धार्मिक और सामाजिक सुधार आंदोलन एकतरफा चला जिससे इतिहास का प्राचीनकाल-हिंदूकाल ओर मध्यकाल-मुस्लिमकाल समजा जाने लगा। यही सभी सुधारको ने समान गलती करदी की सुधार को बढ़ावा देने के लिए इतिहास को गलत व्याख्यायित किया। अनेक धर्मो वाले एक देश में धर्म पर जरूरत से ज्यादा जोर देने से फुट की प्रवृत्ति बढ़नी स्वाभाविक थी।

क्रांतिकारिओ के प्रमुख के रूप मे जाने जाते बालगंगाधर तिलक ने महाराष्ट्रमे लोगो को एकजुट करने के नेक काम के लिए शिवाजी उत्सव, धार्मिक उत्सव, गणेश महोत्सव जैसे त्योहार का सामूहिक आयोजन किया लेकिन कुछ लोगो ने अपने स्वार्थ के लिए इसको एकता के बदले सम्प्रदायवाद बताया और कोंग्रेस पर सिर्फ हिन्दू की पार्टी होने का आरोप लगाया जाने लगा।

1905 में बंगाल का विभाजन अंग्रेजो की भारत की बढ़ती राष्ट्रिय एकता को तोड़ने की चाल थी। अंग्रेजो ने तोड़ो ओर राज करो कि नीति अपनाई। बंगाल के ढाका के नवाब ,आगा खान और मोहसिन-उल-मुल्क को पैसा देकर मुस्लिम लीग की स्थापना करवाई ओर मुस्लिम के लिये अलग अधिकारों की मांग चलाई। अंग्रेज यह चलते थी हिंदू-मुस्लिम दोनों अपने को अलग समजे जिससे इस पर राज करना आसान हो जाय।

जिससे1909 में मुस्लिम को अलग मतदान दिया गया जिसपर भारत के बटवारे का  मकान बनाया गया। 1917 के लाहौर अधिवेशन में जब कोंग्रस और मुस्लिम लीग एक हो गए तब उसने मुस्लिमो के लिए अलग मतदान मंडल को स्वीकार किया। मतलब की देश में हिन्दू- मुसलमान के राजनैतिक हित समान नहीं है ऐसा संदेशा गया जिसने आगे चलकर साम्प्रदायिकता को कभी ख़तम नहीं होने दिया।
(अलग मतदान मंडल का मतलब है हिन्दू हिन्दू नेता को मत देगा और मुस्लिम मुस्लिम नेता को )

ब्रिटीशरो सभी देशों में ऐसी ही नीति अपनाई जैसे म्यांमार में मुस्लिम और श्रीलंका में तमिल के खिलाफ। मुस्लिम लीग के सामने हिन्दू महासभा की स्थापना हुई। मुस्लिम लीग सिर्फ मुसलमान का हित देखती थी और हिन्दू महासभा सिर्फ हिन्दू का जिससे 1920 के बाद साम्प्रदायिकता बढ़ने लगी।

कोंग्रेस के नेता और गांधीजी ने कई बार इन लीग और सभा को समझाया पर वे दोनों साथमे अंग्रेजो से मिलकर कांग्रेस विरोधी काम करने लगे। जिसका परिणाम यह हुआ की जब देश में कोई बढ़ा आंदोलन नहीं चल रहा होता है तब साम्प्रदायिकता बढ़ाने का कार्य होने लगता था।

1937 तक बहु सामान्य स्तर का सम्प्रदायवाद था लेकिन 1937 के चुनाव में मुस्लिम लीग को कम सीट मिलने की वजह से उसने मत लेने के लिए कट्टर साम्प्रदायिकता का रास्ता अपनाया। और साम्प्रदायिकता का तीसरा चरण शरु हो गया जिसने 1947 में देश को बाट दिया।

ऐसा नहीं था की कोंग्रेस या किसी नेता ने साम्प्रदायिकता को रोकने का प्रयत्न नहीं किया। देश को एक रखने तथा आजाद  करने में जो जेल गए वह लोग ऐसा गंदा संप्रदायवाद कैसे सहन कर सकते थे किन्तु 1940 के 
साम्प्रदायिकता पर काबू पाना ना मुंकिन था।   


क्या आजादी के बाद भारत में साम्प्रदायिकता खत्म हो गयी? (Communalism after Independence)



नही, साम्प्रदायिकता खत्म नहीं हुई ब्रिटिशरो ने पिछले सो सालो से उगाया साम्प्रदायिकता के इस वृक्ष का फल आना बाकि था जो आजादी के बाद भी धीरे धीरे बड़ा होता गया। शरु के कुछ सालो तक सब कुछ शांत रहा लेकिन 1961 के जबलपुर दंगो में साम्प्रदायिकता ने फिर सर उठाया।


 इंदिरा गांधी के समय शिख दंगे हुए , राजीव गांधी के कार्य काल में राम जन्म भूमि की उग्र मांग, शाहबानो का केस ओर 1991 में बाबरी मस्जिद ध्वंस ने साम्प्रदायिकता को बहुत बढा दिया।


21 मी सदी मे 2002 में गोधराकांड, 2012 में मुज़्ज़फ्पुर दंगे, असम राज्य में हुए दंगे, हाल के वर्षों में हुए नागरिकता अधिकार कानून विरोधी आंदोलन, दिल्ली के दंगे और कोरोना की महामारी में तबलीगी जमात के लोगो का मुद्दा इसने हिन्दू- मुस्लिम के बीचकि खाय बहुत गहरी करदी है।


सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएँ (Examples of Communal Violence)


  • 1961 - जबलपुर दंगे 
  • 1964- राउकेला।, 1965- जमशेदपुर , 1967- रांची  पूर्व पाकिस्तान (Bangladesh) से आये शरणार्थी को बसाया जाने के विरोध में 
  • 1969 - अहमदाबाद  जनसंघ और इंदिरा गाँधी के सरकार के बिच मुस्लिम मुद्दे को लेकर हुए दंगे 
  • 1974 - मुंबई पुलिस द्वारा दलित पेंथर (Dalit Panther) की रैली को रोकने की वजह से 
  • 1984 - इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद शिख विरोधी दंगे जिसमे 4000 शिख मारे गए 
  • 1985- शाह बानो केस तथा बाबरी मस्जिद - राम जन्म भूमि विवाद जिसने 80 के दशक में  बहुत हिंसा फेलाई 
  • 1992 - बाबरी मस्जिक ध्वंस दक्षिण पंथी द्वारा 
  • 2002 - गुजरात के दाहोद में रेल के डब्बे को जलाना जिस दंगे में 1000 ज्यादा लोगो ने अपनी जान खो दी थी। 
  • 2013 - मुज्जफरपूर में हिंदू - मुस्लिम के बिच दंगे
  • 2015 - से शरू हुए mob lynching में 100 से ज्यादा लोगो मारे गए
  • 2020 - दिल्ही में नागरिकता सुधर कानून के विरोध बाद भड़के दंगे  
consequences of communalism

सांप्रदायिकता के कारण क्या है? (Reasons of communalism )

1. ऐतिहासिक परिबल ( historical factor )

इतिहास का हवाला देकर एक धर्म के लोगो को दूसरे धर्म के लोको के साथ लड़वाया जाता है। जैसे मुस्लिम ने हिन्दू मंदिर को लुटा तो उसका बदला अभी हमको लेना चाहिए ऐसी गुमराह करने वाली बाते। जैसे हालही में   इ. स. 1818 में लड़ी गई भीमा कोरेगांव युद्ध का हवाला देकर औऱ गलत अर्थ निकालकर हिंसा भड़काई गई थी ।

2. राजनीति (Communal Politics)

देश के नेता मतो को प्राप्त करने के लिए धर्म का हथियार के रूप में इस्तमाल करते है कई बार यह राजनैतिक दले अपनी टिकिट भी धर्म के आधार पर बांटती है। राज नेताए भलेही दंगे न करवाये लेकिन वह साम्प्रदायिकता का ऐसा वातावरण बनाते है की कई लोग धर्म के नाम पर दूसरे धर्म के लोगो पर टूट पड़ते है।

आपने एक बात जरूर देखी होगी की दंगे चुनाव के आसपास ही होते हैं और दंगों के बाद राजनीतिक दले गीध की तरह मत लेने के लिए मंडराती दिखाई देती है। नेता बढ़ी आसानी से सांप्रदायिकता मिटा सकता है पर कोई करता नहीं है इसी लिए राजनीति सांप्रदायिकता एक मुख्य  परीबल है। 

3. शिक्षण का नीचा स्तर (Educational Factor)

देश में  साक्षरता का दर को बढ़ रहा है लेकिन समझ का स्तर बहुत गिरा हुआ है । एक शिक्षित और समझदार व्यक्ति को धर्म के नाम पर नहीं भड़काया या जा सकता।

अगर हम विभिन्न दंगो को देखें तो दंगों में शामिल होने वाले लोगों में  ज्यादातर या सभी शिक्षित ही होते हैं। क्योंकि दंगे करने वाले भी निरक्षर लोगो को पसंद नहीं करते। 

भारत देश की एक खासियत है यहां अनपढ़  व्यक्ति ज्यादा समझदार होते हैं।ओर एक सबूत देखे तो कश्मीर में मारे जाने वाले सभी आतंकवादी कमांडर  स्नातक की डिग्री तक पढ़े लिखे होते हैं। 

4.  मीडिया (Media)

आज हम टीवी शुरू करें तो  हिंदू मुसलमान यही समाचार देखने को मिलेंगे।  मीडिया बेरोजगारी, गरीबी, निरक्षरता , मानवीय अधिकारों, पर्यावरण की बात करने के बजाए सांप्रदायिक मुद्दों को बहुत बढ़ा चढ़ाकर बताते हैं। जिससे उभरते युवा वर्ग में सांप्रदायिकता की भावना आ जाती है और देश की राष्ट्रीयता पीछे छूट जाती है। 

मीडिया में भी सोशियल-मीडिया सांप्रदायिकता की सारी हदें पार कर देता है। facebook, instagram  ओर whatsapp पर हंमेशा कट्टर संप्रदायिकता की बातें ही चलती रहती है। 

5. आर्थिक परिवल (Economic factor)

भारत में कई जाती, लघुमति समुदाय आर्थिक रूप से पछात  है  जिनको नेताओं, व्यापारियों द्रारा शोषण किया जाता है, जिससे वह शोषित समुदाय हमेशा एकेलापन  महसूस करता है। ऐसे समूह आसानी से सांप्रदायिकता का शिकार बन जाते है। 

6. पुलिस की भूमिका(Role of police) 

गुनाहों, दंगे आदि में कई बार पुलिस की कार्यवाही निष्पक्ष नहीं होती। कई बार सुनने को आता है की नेता के विरुद्ध केस को पुलिस ने महत्व नहीं दिया। यह तब ज्यादा खतरनाक होता है जब दोनों पक्ष अलग धर्म के हो और पुलिस किसी एक का साथ देता है।  

पुलिस कुछ समुदाय को गुनेगार ही मानती है और गुनाहों के केस में पहले से ही दोषि मान लिया जाता है।
पुलिस सत्ता और पैसे वालों का साथ देती है जिससे लघुमति पक्ष नाराज रहता है और यह गुस्सा दंगे के वक्त बाहर आता है।

7. संपत्ति का असमान वितरण (Economic Inequality)

हम जानते है की भारत में 80% संपत्ति सिर्फ ऊपर के 10% लोगो के पास है।  ऐसे में अगर कुछ ही समुदाय के लोग ज्यादा संपत्ति रखते तो अन्य समुदाय असुरक्षित महसुस करता है। हिंदू और मुसलमान दोनों में अमीर और गरीब दोनों प्रकार के लोग है।  इस परिबल में एक समुदाय के अंदर ही घृणा की भावना (Communal Tension) पैदा हो सकती है। 


8. पाकिस्तान(Pakistan)

पाकिस्तान हमेशा भारत में आंतकवाद के जरिए सांप्रदायिकता फैलाना चाहता है हिंदू-मुस्लिम को आपस में लड़ा कर  देश को तोड़ने का ही काम करता है। भारत में दंगे भड़कने से पाकिस्तान की इच्छा पूरी होती है। वह एकता में बाधा डालकर देश का विकास को रुकने का प्रयास करता है। दंगे या कोई ओर घटाना से किसी मुस्लिम से अन्याय हुआ तो वह व्यक्ति पाकिस्तान के लिए महत्त्वपूर्ण हो जाता है।  कई बार पाकिस्तान के जासूस ऐसे लोगो को आतंकवादी बनाने के लिए भेजते है।  


9. धार्मिक गुरु (Religious Guru)

धार्मिक गुरु बिन सांप्रदायिकता और निष्पक्ष धर्म का ज्ञान देने के बजाय कट्टरवादी ज्ञान देते हैं और धर्म परिवर्तन की बातें करते हैं। हिंदू मुस्लिम धर्म गुरु आपसमे मिलकर धर्म सुधार की बाते करने के बजाये एक दुसरे की खामियां का गुणगान करते है। 

दंगे मैं नेता अपना मत निकाल लेता है और ऊचे स्तर के लोग भी अपना फायदा ढूंढ लेते हैं। दंगों मैं सिर्फ गरीब और मध्यम वर्ग को ही नुकसान उठाना पड़ता है। अभी तक देश को सांप्रदायिकता के कारण बहुत नुकसान झेलना पड़ा है अब इसको रोकना होगा।  सांप्रदायिकता का रोकने के लिए कुछ उपाय सोचते हैं।

हालही में पाकिस्तान में एक घर में खोद काम में बहुत पुरानी बौद्ध की मूर्ति मिली तो वहाके एक मौलाना ने अपने हाथो से हथोड़ा ले कर मूर्ति को इस्लाम का नहीं है ऐसा बताकर तोड़ डाला भारतीय समाचार पत्रों ने मुखपृष्ठ पर छाप कर बहुत महत्व दिखाया। यहा पर मौलाना और मिडिया दोनों ने परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। 


सांप्रदायिकता के दुष्परिणाम (Consequences of Communalism)


  1. जान-माल की हानि उठानी पड़ती है
  2. समाज में स्थापित एकता में गिरावट आती है
  3. एक दूसरे धर्म के लोग आपसमे व्यापार करना बंध कर देते है जिससे आर्थिक विकास में बाधा आती है।
  4. जिस जगह पर दंगे होते है वहा संपति का नाश होता है।
  5. कई परिवार आपने कमाने वाले व्यक्ति को खो देते है।
  6. समुदाय और कट्टर भावना की ओर चले जाते है
  7. 2020 में दिल्ली में हुए दंगे में कई स्कूल को बहुत नुकशान पोहचा है जिससे वहा पढ़े विद्यार्थी की भावना आहत हुई है। इससे भी ज्यादा अब वहा पढ़ रहे बच्चो को धर्मनिरपेक्षता का पाठ कैसे पढ़ायेगा। उन बच्चो को क्या जवाब देंगे की शाला में नुकशान किसने किया।
  8. संवैधानिक मूल्यों को पालन करना कठिन हो जाता है।
  9. देश पर आतंरिक तथा बाह्य खतरा बढ़ने लगता है।
  10. सबसे महत्वपूर्ण बात भारत की जो विश्व में पहचान है वह गिर जाती है। 



सांप्रदायिकता का समाधान (Solution to Communalism)


ऊपर के सभी कारण को एक-एक करके हल कर दे तो उपाय निकल सकता है।

1 संपत्ति का सामान वितरण किया जाए। सब को आर्थिक अधिकारों सुरक्षित करने होगे ।


2 शिक्षण में बिन सांप्रदायिकता सिखाई जाए। इतिहास पढ़ने का तरीका तटस्थ अपनाया जाए। जैसे मध्यकाल को मुस्लिम काल न बता कर एक तटस्थ द्रष्टिकोण विकसित किया जाय।  शाला को व्यक्तित्व निर्माण का औपचारिक संस्था मानते यहां बच्चो को मित्र भावना और देश के निष्ठां सीखानी होगी। हा, इससे पहले शिक्षकों को तालीम दे कर उनके विचार बदलना जरूरी है  


4 पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार किया जाय। कई कमिटी ने सुझाव दिए है उनका पालन करना चाहिए। 


5 चुनाव प्रचार में धार्मिक मुद्दों पर नहीं प्रचार कर सकते ऐसे सुप्रीम कोर्ट के नियम को अमल किया जाए


6 मीडिया की भूमिका में सुधार। प्रिंट मिडिया और news channel के लिए स्पष्ट नीति-नियम होने चाहिये 


7 हिंदू राष्ट्र या मुस्लिम राष्ट्र के बदले एक अखंड भारत के दृष्टिकोण ही अपनाया जाय


8 जवाबदेह नागरिक होने के खातिर हम साम्प्रदायिकता से अपने को दूर रखेंगे ऐसी प्रतिज्ञा करनी चाहिए। Social Media जैसे Facebook, Whatsapp पर सांप्रदायिक post सोच समझकर डालना चाहिए। आज तो deep fake जैसी technology आ चुकी है उसमे हमे गुमराह न कर शके उसका ध्यान रखना चाहिए।  

9. नेता को इतिहास को गलत ढंग से नहीं प्रस्तुत करना चाहिए और जनता को ऐसे नेता को मतभी नहीं देना चाहिए। 

10. सबसे उत्तम तरीका है रोजगार की सुविधा मिले, न्याय मिले जिससे लोग साम्प्रदायिकता की और जायेंगे ही नहीं। 


unity in diversity

अंत में महत्वपुर्ण बात समजे ले की सिर्फ Hindu-Muslim के बिच सांप्रदायिक टकराव नहीं है। दोनों धर्मो अंदर भी कई संप्रदाय या जातीया है जो धर्म को खोखला करती जा रही है उसको भी ध्यान में लेना जरूरी है। 

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इस पूरी जानकारी के बाद आप सांप्रदायिकता पर निबंध(Essay) लिख सकते हो और Upsc या psc परीक्षा में जवाब दे सकते हो।

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