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न्यायलय की अवमानना क्या है ? Contempt of court Meaning in Hindi


न्यायलय स्वतंत्रता से काम कर सके, कोई व्यक्ति ,संस्था या सरकार न्यायलय की कार्यवाही में बाधा न डाल सके उसके लिए संविधान में न्यायलय को The contempt of court act 1971 के अंतर्गत विशेष शक्ति प्रदान की है। 


अगर कोई न्यायालय की कार्यवाही में बाधा डालता है तो उस पर कोर्ट न्यायलय की अवमानना का आरोप लगा कर उसके ऊपर मुकदमा चला सकती है। चलिए विस्तृत में उदाहरण के साथ समझते है की न्यायलय की अवमानना क्या है ? What Is Contempt of court ?

सीधे शब्दों में कहे तो न्यायालय की बात न मानना उसकी अवमानना माना जाता है। 


न्यायालय की अवमानना के प्रकार (Types of contempt) 

न्यायालय की अवमानना के दो प्रकार है। 

example of contempt of court in India


सिविल अवमानना (Civil Contempt of Court)

अगर कोई व्यक्ति जान बुज कर न्यायालय के आदेश, निर्देश , रिट या चुकादे की अवहेलना करता है वह सिविल अवमानना है। 


Utpal Kumar Das v. Court of the Munsiff, Kamrup इस केस में न्यायालय ने प्रतिद्वंदी को न्यायिक कार्यवाही में सहायता देने का आदेश दिया था। लेकिन अचल संपत्ति देने के लिए अदालत द्वारा निष्पादित हुक्मनामा को कुछ बाधा के चलते प्रतिद्वंदी पूरा न कऱ पाया। जिसके चलते कोर्ट ने सहायता न करने की वजह दे कर उस पर मुकदमा चलाया। 


U.P. Resi. Emp. Co-op., House B. Society v. New Okhla Industrial Development Authority इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नॉएडा के प्राधिकारी को आदेश दिया की प्लॉट के वितरण में लोगों के द्वारा दिए हुए हलफनामे(Affidavit) की सत्यता की जाँच करे और जनता  के सामने रखे। लेकिन एक व्यक्ति ने गलत affidavit दे कर कोर्ट को गुमराह किया। जिसके चलते रजिस्ट्री ने उसके उपर न्यायालय की अवमानना का केस दर्ज करवाया। 


फौजदारी अवमानना (Criminal Contempt of Court)

कोई भी ऐसी क्रिया, लिखित , चलचित्र , चिन्ह जो न्यायलय का अपमान करती हो या न्यायलय के कार्य में बाधा पहोचती हो तो वह फौजदारी अवमानना है।  


Jaswant Singh v. Virender Singh इस मामले में एक वकील ने उच्च न्यायालय के जज पर अपमानजनक और निंदनीय हमला किया। घटना ऐसी थी की कोर्ट में वकील ने चुनाव पिटीशन दर्ज की थी और वह चुनाव याचिका में आगे की दलीलों के लिए रुकना चाहते थे और चुनाव याचिकाओं को भी हस्तांतरित करना चाहते थे।। लेकिन कोर्ट का फेसला उनके इच्छा के विरुद्ध होने से जज पर हमला कर दिया। 


अवमानना की शक्ति (Power of contempt)

न्यायालय के अवमानना पर सजा देने की शक्ति उच्च न्यायलय (High Court) को Section 10 of The Contempt of Courts Act of 1971 के अंतर्गत और 

सर्वोच्च न्यायलय (Supreme Court )को संविधान के अनुच्छेद 129 एवं 215 के अंतर्गत होती है। 

अगर कोई व्यक्ति नीचली अदालत की अवहेलना करता है तो नीचली अदालत सबंधित उच्च न्यायालय को यह मामला बताकर केस दर्ज करवाते है। ऐसे मामलों में उच्च न्ययालय ही Contempt of  court का केस चलाती है। 

कानून के अनुसार न्यायालय की अवमानना की कार्यवाही कोर्ट को एक साल के अंदर ही शरू करनी होगी।  



किसको अवमानना नहीं माना जायेगा? (What is not contempt of court?)

न्यायालय की कार्यवाही का निष्पक्ष और सटीक रिपोर्टिंग करना न्यायालय की अवमानना नहीं माना जायेगा। 

केस की सुनवाही ख़तम होने के बाद या फिर केस को पूर्ण घोषित करने के बाद उसपर की गई कानून के अनुसार निष्पक्ष आलोचना न्यायालय की अवमानना नहीं माना जायेगा।    


संविधान में उल्लेख (Constitutional Reference)

अनुच्छेद 129: सर्वोच्च न्यायालय को स्वंय की अवमानना के लिये दंडित करने की शक्ति देता है।
अनुच्छेद 142 (2): यह अनुच्छेद अवमानना के आरोप में किसी भी व्यक्ति की जाँच तथा उसे दंडित करने के लिये सर्वोच्च न्यायालय को सक्षम बनाता है।
अनुच्छेद 215: उच्च न्यायालयों को स्वंय की अवमानना के लिये दंडित करने में सक्षम बनाता है।


दंड का प्रावधान  (Punishment for contempt of court)

दंड छह महीने का साधारण कारावास या 2000 रूपए तक का जुर्माना या दोंनों एक साथ हो सकता है।


वर्ष 1991 में सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया कि उसके पास न केवल खुद की बल्कि पूरे देश में उच्च न्यायालयों, अधीनस्थ न्यायालयों तथा न्यायाधिकरणों की अवमानना के मामले में भी दंडित करने की शक्ति है।


उच्च न्यायालयों को न्यायालय की अवमानना अधिनियम, 1971 की धारा 10 के अंतर्गत अधीनस्थ न्यायालयों की अवमानना के लिये दंडित करने का विशेष अधिकार प्रदान किया गया है।



चलिए हम इस बात पर चर्चा करते है की क्या न्यायालय के पास अपने अवमानना के खिलाफ सजा देने की शक्ति होनी चाहिए या नहीं ?


शक्ति होनी चाहिए के पक्ष में (Need of Contempt of court)


  1. न्याय की नींव की रक्षा करने के लिए न्यायालय के पास सजा करने की शक्ति होनी चाहिए। 
  2. मान लीजिये सुप्रीम कोर्ट किसी मांमले में सुनवाही करके आदेश देती है। अब इस आदेश को संस्था, जनता और सरकार को मानना पड़ेगा लेकिन यदि कोई कोर्ट के आदेश को नहीं मानता है तो कोर्ट के पास ऐसी शक्ति होनी चाहिए जिससे न्याय को मनवा सके। 
  3. अगर कोर्ट के पास सजा करने की  शक्ति नहीं होगी तो कोई भी उसकी बात मानेगा नहीं। 
  4. न्याय की प्रणाली तथा न्यायालय के शिष्टाचार को बनाये रखने के लिए इस शक्ति का होना आवश्यक है। नहीं तो कोई भी व्यक्ति या वकील भरे कोर्ट रूम में शिष्टाचार का भंग कर सकता है। जैसे गाली-गलोच ,धमकी 
  5. कई बार जजो पर गलत आरोप लगा दिया जाता है जिससे जज और न्याय प्रणाली के सम्मान को भारी नुकशान उठाना पड़ता है। 


न्यायलय के अवमानना पक्ष सबंधित केस (Cases of Contempt of court)


1. न्यायालय की अवमानना का उल्लेख भारत का सर्वोच्च न्यायालय की माननीय पीठ जगदीश सिंह खेहर और माननीय के.एस. राधाकृष्णन  द्वारा किया  गया है। सुब्रत रॉय सहारा बनाम भारत संघ केस में 

"इस अदालत द्वारा पारित आदेशों का पालन नहीं होता है तो वह न्याय प्रणाली की नींव को हिला देती है और कानून के शासन को कमजोर करता है। जिसको बनाये रखना कोर्ट का काम है। यह लोगों के विश्वास और आत्मविश्वास को बनाए रखने के लिए आवश्यक भी है।"

2. Hiralal Dixit vs. state of UP 1954 में कहा गया की " सिर्फ न्याय की प्रणाली में बाधा डालना इतना ही Contempt of Court नहीं है। अगर जनता की नजर में कोर्ट के सम्मान एवं न्याय के उपर विश्वास में कोई कमी हो ऐसे क्रिया के विरुद्ध भी न्यायालय अवमानना का मुकदमा चलाया जा सकता है। "


3. K. Daphtary vs. O.P. Gupta 1971 केस में कहा गया की "अगर जनता की नजर में कोर्ट के सम्मान एवं न्याय के उपर विश्वास में कोई कमी हो, न्यायाधीशों के सम्मान की हानि हो आदि मामलो में सुप्रीम कोर्ट भारतीय संविधान के अनुच्छेद 129 और अनुच्छेद 142 के अंतर्गत न्यायालय की अवमानना माना जायेगा। "


शक्ति होनी चाहिए के विरोध में (Against Contempt of court)


विश्व की काफी सारी लोकशाही जैसे USA , UK , Canada आदि में इस शक्ति को ख़ारिज कर दिया है। मतलब की वहा की कोर्ट अब इस शक्ति का इस्तेमाल नहीं कर रही है। 

हमने इस कानून को ब्रिटिश से प्रभावित हो कर लिया था लेकिन वहा भी यह कानून बहुत शक्तिहिन हो चूका है। 2012 में UK के कायदा कमीशन में इस कानून को शून्य घोषित कर दिया। 

UK  के Daily Mirror समाचार पत्र के सामने 1980,2016 में न्यायालय की अवमानना के केस सामने आये लेकिन UK की न्यायालय ने इस केस को ख़ारिज कर दिया। 

कोरोना की महामारी में बहुत ही महत्वपूर्ण मामलो की सुनवाही होनी चाहिए लेकिन सुप्रीम कोर्ट प्रशांत भूषण के सामने contempt of court का केस चला रही है जो बाद में भी किया जा सकता है। 

1971 के The Contempt of court कानून में व्याख्या बहुत विस्तृत है ओर कोर्ट के पास इस मामलो में Suo-Motu शक्ति भी है जो इस कानून का दुरूपयोग करवा सकती है। 

भारतीय बंधारण के अनुच्छेद 19(1)a वाणी की स्वतंत्रता प्रदान करता है लेकिन अनुच्छेद 129 और 215 न्यायालय के सामने बोलने की स्वतंत्रता को रोकता है। 

conflict of interest (रुचियों का भेद) : जज खुद अपने अवमानना के केस की सुनवाही करता है यह तो कुदरती न्याय की सिद्धांत के भी विरुद्ध है। 

यह कानून लोकशाही के मूल्यों विरुद्ध है लोकशाही में जनता को बोलने का अधिकार होता। अगर जनता कुछ भी नहीं बोलेगी तो न्यायालयों में भ्रष्टाचार बढ़ जायेगा। कई ऐसे मामले सामने आते भी है जैसे योन-शोषण के आरोप लगे थे जिसमे सही तरिके से कार्यवाही भी नहीं हुई। 


अगर हम अपने भारत देश की केस की बात करे तो 

Cases and Example of contempt in India


1. Auto Shankar's case, 1994 (R. Rajagopal vs State Of T.N) में कोर्ट ने 'Sullivan Doctrine' को उजागर किया जिसके अनुसार जो लोग जाहेर जनता के लिए है उन पर टिपण्णी की जा सकती है और आरोप भी लगाए जा सकते है चाहे वह आरोप जूठे ही क्यों न हो Publice persone को हमेशा खुल्ली किताब की तरह रहना चाहिए।    


2. Duda P.N.V. Shivshankar Case 1998 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा की जजों को अपनी गरिमा को उच्चा रखने के लिए इस कानून का इस्तमाल नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र में विचारो , वाणी , आलोचना इन सबका महत्व है जजों को इसे न्याय प्रणाली को हानि न पोहचे उस सीमा तक आवकारना चाहिए। 

3. Arundhati Roy Case में कहा गया की राष्ट्र हित या जनता की हित में न्यायालय की आलोचना करना इसे न्यायालय की अवमानना नहीं माना जायेगा। 

4. Justice Karnan’s case न्यायाधीश कर्णन उच्च न्यायालय के पीठासीन जज थे जिनको 6 मास की जेल हुई थी। जज ने february 2017 में अपने उपरी 20 जजों पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था। उसने प्रधानमंत्री मोदी को पुरावो के बगैर खत लिखकर आरोप लगाया था। 

5. MV Jayrajan नामके केरल के एक विधायको  सार्वजानिक में कोर्ट को Idiot बोलने पर january 2015 में कुछ दिनों तक जेल जाना पड़ा था।  

6. अक्टूबर 2018 में दिल्ही हाई कोर्ट ने पत्रकार ऐस.गुरुमूर्ति के खिलाफ न्यायालय की अवमानना का मुकदमा चलाया। मामला यह था की S.Gurumurthy ने ट्वीट किया की भीमा-कोरेगांव केस में न्यायालय का निर्णय पक्षपाती है। 

7. उसी महीने अक्टूबर 2018 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक पत्रकार केतन तिरोड़कर को तीन मास की सरल जेल और 2000 रुपये जुर्माने की सजा दी थी। मामला यह था की पत्रकार ने पदस्थापित जज तथा निवृत जज के उपर मान हानि(Defamatory Allegations) का आरोप लगाया था।   

8. July 2020 में सुप्रीम कोर्ट के जज प्रशांत भूषण के सामने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ दो tweet करने के आरोप में न्यायालय ने केस दर्ज किया। कोरोना की इस घडी में ऐसे केस को ज्यादा महत्व देने से सुप्रीम कोर्ट की आलोचना भी हुई।  

अवमानना के सामने बचाव (Defense against a contempt charge)

सच्ची आलोचना होने के बावजूद कई सालो तक इस कानून पर न्यायाधीशों का एकाधिकार रहा। कई ऐसे मामले सामने आये जिसमे आलोचनकार सही होने बावजूद उस पर मुकदमे चले। 

फिर सरकार ने संज्ञान ले कर 2006 में इस कानून के secation 13 में बदलाव करके सार्वजनिक हित में निष्पक्ष आलोचना को इस कानून के सामने रक्षण प्रदान किया जिसे 'सत्य का बचाव (Defense of Truth)' नाम दिया गया। (यह केस Indirect Tax Practitioners’ Association v. R.K. Jain था।)


न्यायालय की कार्य प्रणाली और जनता की बोलने की स्वतंत्रता के बिच संतुलन बनाना जरूरी है 

The contempt of court act 1971 



Some Questions

1. Is it a contempt of court if Judge orders mandatory presence of parties and one of the parties can not appear?

Ans: Yes, Judge orders to the mandatory presence so have party have to. The judge can start Civil contempt of court or given a chance to a presence in the next hearing.

2. An advocate gets another job and stops practicing as an advocate but the same is in criminal contempt of court is the person punishable as an advocate or as an ordinary person?

Ans: Law applies the same for everyone; it doesn't matter he has an Ordinary person, Advocate, or Judge(Even supreme court judge), you can read an example of cases above. like Justice Karnan’s case, Prashant Bhushan case



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